मुस्कराती रहीं गीत गाती रहीं ...[गीत] - शिवेन्द्र कुमार मिश्र

तृषा'कान्त' चाँदनी रात थी और नदी का था तट बल खाती हवा मन रहा था भटक तुमको आवाज दी पर तुम आई नहीं गुनगुनाती रहीं गीत गाती रहीं दूर आकाश में व्योम के कोण से उठ रहे मेघ थे साँवले साँवले मैने इगिंत किया तुमने जाना नहीं मुस्कराती रहीं गीत गाती रहीं मेघों की गर्जना दा... [पूरी पोस्ट]
writer श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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[03 May 2009 10:41 AM]

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