हाई-टेक होती जिंदगी में रि‍-टेक की गुंजाइश

अरे बिरादर !! एक ही व्‍यक्‍ति‍ अलग-अलग जीवन-स्‍ि‍थति‍यों में जीता है, अलग-अलग उम्र को जीता है और अपने फलसफे बनाता है.... या नहीं भी बनाता....। लेकि‍न फि‍तरत यही होती है कि‍ व्‍यक्‍ति‍ अपनी ही मूरत को बनाता है, सँवारता है, फि‍र उसे तोड़कर चल देता है। हमारा शहर फैलत... [पूरी पोस्ट]
writer जितेन्द़ भगत
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[02 May 2009 02:09 AM]

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