तुम डरो, तो डरो!
इश्क नहीं है कविता जैसा... तो? भाव नहीं है राधा जैसा... तो? तुम ढूंढो-फिरो... कन्हैया, राम, रसूल... मैं जानता हूं... मैं बना रहना! तुम खुदा बनो, तो बनो। मेरे पद डगमग हैं... तो? मेरी गति दुर्धर है... तो? तुम अपनी फिक्र करो, नसीहत मत दो... मैं जानता हू...
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देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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[01 May 2009 15:29 PM]



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