पलक झपकी न थी कि मंजर बदल गया 'पाखी'...
ताश पत्तों के घरौंदे से गुजरा था तूफ़ान कोई न जाने कहाँ कहाँ तक बिखर गई जिन्दगी सारी बड़ी भीड़ में बच्चे सा खो गया अरमान कोई बदहवास उसने उसे ढूँढा कहाँ नहीं जिन्दगी सारी भर आये दिल और ग़मजदा आँखों के कोनें निकल के दरिया वहां से बहती रही जिन्दगी सारी प...
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abhivyakti
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[01 May 2009 14:59 PM]



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