ख़राशें
पिछले नाटक में बहुत हँस लिये अब हँसी रोक कर एक गंभीर विषय पर कुछ देर सोच लें। गुलज़ार के शब्दों में 'ज़रा सा आओ न, बैठो वतन की बात करें।' यों तो वतन की बात टाइमपास करने के लिये की जाती है। बैठकों में ज्ञान प्रदर्शन के लिये की गई बौद्धिक बकवास। पर हम...
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मथुरा कलौनी
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[01 May 2009 12:08 PM]



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