चुनाव और मुद्दा
किसी को बाबरी का गम, कोई मस्जिद बना रहा | है वक़्त वादों का सो, हर कोई सपने दिखा रहा | तुरत रंग बदलने का हुनर, यहाँ अब पास है सबके | जो कल तक साथ था , वो ही यहाँ खंजर चला रहा | है जिसका सोचने का काम, वो बस सोचता रहे | उन्हें फुर्सत नहीं इतनी , की वो...
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Tapashwani Anand
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[01 May 2009 06:37 AM]



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