कोई दरिया नही हूँ मैं
अब क्या डुबोयेंगीं मुझे तूफां की ये मौजें साहिल हूँ समुन्दर का कोई कस्ती नहीं हूँ मैं ! अब क्या बुझायेंगी मुझे गम की ये आंधियां जलता हूँ अनल जैसे कोई दीपक नहीं हूँ मैं ! ना खौफ रहबरी का ना डर है दुश्मनों से अभेद दुर्ग हूँ एक कोई बस्ती नहीं हूँ मैं !...
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निर्झर'नीर
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[30 Apr 2009 07:42 AM]



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