उन चुनावों का मज़ा अब कहां

अर्ज़ है... चुनावी महाभारत अपने आखिरी पड़ाव में है, लेकिन इस बार जिस चीज़ की कमी सबसे ज्यादा महसूस की गई, वो था चुनाव प्रचार का ज़ोर-शोर। लोकसभा के लिए महासंग्राम का बिगुल तो बजा, लेकिन न तो बिगुल दिखा, न शोरशराबा करते चुनाव प्रचारक। आम-आदमी का चुनाव आम आदमी से... [पूरी पोस्ट]
writer अबयज़ ख़ान
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[29 Apr 2009 13:58 PM]

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