ट्रेन में एक शाम
वह जिस तरह लेटा था, उसे युवा हो जाना चाहिए था. वह स्त्री इस तरह उस अधेड़ की मां लग रही थी. बाहर कुछ नहीं दिख रहा था. ट्रेन को पता था, कहां जाना है, इसीलिए वह बिना हांफे दौड़ रही थी. खिड़की पर टंगा परदा अचानक उठ जाता, पर हवा जैसी कोई चीज़ नहीं आती. व...
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Geet Chaturvedi
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[29 Apr 2009 07:25 AM]



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