कुछ आहटें बाहर है ,कुछ दस्तकें भीतर,समय के सबसे विध्वंसक क्षणों मेंअपनी गहरी प्रार्थनाओं मैं ....,
अब भी कुछ टूट रहा है धरती मैं, और छूट रहा है ,आकाश मैं , थोडा सा झांकते हुए ,चट्टानों से, कुछ भीग रहा है पहाडों के पार, कुछ आहटें बाहर है , कुछ दस्तकें भीतर, समय के सबसे विध्वंसक क्षणों मैं, अपनी गहरी प्रार्थनाओं मैं किस तरह पवित्र और सुरक्षित रखा है...
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Vidhu
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[28 Apr 2009 14:26 PM]



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