वो अश्क किसके थे जिनमे भीगी थी जिन्दगी सारी
अबसार भीगे थे,जुबाँ खामोश, थी मन में बेकरारी किस इजबार से मुस्करा रहे थे किसी ने क्या ईशारा कर लिया छोड़ के आये जात मजहब अजलाल औ दुनियादारी तब डर न था बैठ बारूद पे हमने शरारा कर लिया शानो पे सर रख ग़म और इब्तिदा सुनाते थे रात सारी जब छोड़ गए, अब्तर-आशि...
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abhivyakti
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[29 Mar 2009 09:25 AM]



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