अलग-अलग दायरे...
हल्लो नीरू " 'अरे !तुम आ गईं!.... आओ-आओ' मैं हाथ की झाडू वहीं छोड़ खड़ी हो गई थी, शर्म से पानी-पानी। 'तुम काम कर रहीं थीं, मैंने डिस्टर्ब कर दिया न,जल्दी आ के?' 'नहीं यार....वो तो आज इतवार है न, बस इसीलिए सफाई का काम देर तक चलता रहता है। अरे बैठो न!' र...
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वन्दना अवस्थी दुबे
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[19 Apr 2009 07:44 AM]



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