कह गई आकर हवा
केतकी वन, फूल उपवन, प्रीत मन महके सांझ आई बो गई थी चाँदनी के बीज रात भर तपते सितारे जब गये थे सीज ओस के कण, पाटलों पर आ गये बह के कह गई आकर हवा जब एक मीठी बात भर गया फिर रंग से खिल कर कली का गात प्यार के पल सुर्ख होकर गाल पर दहके कातती है गंध को पुरब...
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राकेश खंडेलवाल
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[27 Apr 2009 12:22 PM]



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