कभी यूँ भी आ मेरी आँखों मे
कभी यूँ भी आ मेरी आँखों मे, कि मेरी नज़र को भी ख़बर ना हो, मुझे एक ऐसी रात नवाज़ दे, जिसकी कोई सेहर ना हो, गीली आँखों मे कुछ गीले से ख्वाब हैं, आराम से उठाना उन्हें, कहीं टूट ना जाएँ वो, दिन की धूप में सुखा कर तय कर के रख देना, कि फिर इन आँसुओं से भीग...
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Gurnam Singh Sodhi
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[27 Apr 2009 00:33 AM]



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