होली पर असभ्य होने का सुख…
मैं सुबह-सवेरे उठकर घर से बाहर निकला ही था कि एक अनजानी सी आवाज सुनाई दी, “क्या आप गिरिराज हैं?”... “जी हाँ, आप...?”, मैने चहरे पर कुछ हद तक झुर्रियाँ बनाते हुए पूछा। “होली है...”, कहते हुए उन सज्जन नें मुझे रक्तनुमा दिखाई देने वाले रंग से रगड़ना शुरू...
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गिरिराज जोशी
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[09 Sep 2007 03:37 AM]



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