कसम कनखजूरे के तिरछे कान की

हँसते रहो राजीव तनेजा*** “सुनो”… “ये ‘ट्यूब’ कितने की आती है?”…. “बूत्था(चेहरा) चमकाना है कि दाँत मंजवाने हैँ?”… “क्यों?…मेरे चौखटे को क्या हुआ है?”… “अच्छा-भला तो... [पूरी पोस्ट]
writer राजीव् तनेजा
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[15 Nov 2008 21:52 PM]

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