न मौसम का भारोसा है
हवाओं का भरोसा है न मौसम का भरोसा है; चमन को अब बहारों का न शबनम का भरोसा है। विषैली बेल शंका की उगी विश्वास की जड़ में, न फूलों का न खुशबू का न आलम का भरोसा है। जड़ों में नाग लिपटे हैं जमे हैं गिद्ध डालों पर, कहाँ बैठें न बरगद का न शीशम का भरोसा है।...
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chandrabhan bhardwaj
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[25 Apr 2009 08:24 AM]



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