यादें !
जिद थी पागलपन की हद तक ,दर्द का दर्पण साथ लिए ! जाने कब हम निकल पड़े थे , ज़ख्मो की सौगात लिए ! मन को बहुत संभाला लेकिन ,दिल के हाथों हार गया , यादों की लश्कर का खाली ,आज न कोई वार गया ! कर बैठा मई आत्मसमर्पण,वक्त से कुछ लम्हात लिए! रोजी -रोटी की उलझन...
[पूरी पोस्ट]
Umesh Pathak / उमेश पाठक
16
1
0
1
2
[24 Apr 2009 08:10 AM]



Shuffle








