इंसानों की इस बस्ती में

पदमराग इंसानों की बस्ती में हम भी थे इन्सान यहाँ इंसानों की इस नगरी में अब बसते हैं इन्सान कहाँ जब बसते ही इन्सान नहीं तो हम खुद को क्यू इन्सान कहें क्यूँ प्रेम, जलन और नफ़रत की पीडा को हम यूँ ही सहें इसलिए छोड़ दी हमने भी इंसानों सी हरकत करना क्या बस जीना ही... [पूरी पोस्ट]
writer मनोज द्विवेदी
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[24 Apr 2009 06:39 AM]

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