चल रे मन कहीं और चल .
चल रे मन कहीं और चल ले चल मुझे सावन के फुन्हारों के बीच पूर्वा हवा और सफ़ेद दीवाल बना , आता हुआ बारिस का झोंका . कुएं के पास की दीवाल पर चढ़ , पेड़ के पके अमरुद के पास कि झट पट खायूँ , उतरूं और भागूं घर की ओर . बारिस से बचते - बचाते हुए . चल रे मन , क...
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Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna
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[24 Apr 2009 03:30 AM]



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