हिमाल : अपना-पहाड़
मैंने सबकुछ देखा है। मेरी बूढ़ी आंखों में... आज भी पुराने दृय साफ-साफ उभर आते हैं। फिरंगियों से जूझते आज़ादी के परवानों को देखा है... मैंने। शुरू में ये चिंगारी हल्की ही रही, पर जैसे-जैसे वक्त गुजरा.... चिंगारी ने ज्वाला का रुप ले लिया। लेकिन कुमांऊ...
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जितेंद्र भट्ट
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[23 Apr 2009 09:50 AM]



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