क्षितिज

कविताओं के मन से तुमने कहीं वो क्षितिज देखा है , जहाँ , हम मिल सकें ! एक हो सके !! मैंने तो बहुत ढूँढा ; पर मिल नही पाया , कहीं मैंने तुम्हे देखा ; अपनी ही बनाई हुई जंजीरों में कैद , अपनी एकाकी ज़िन्दगी को ढोते हुए , कहीं मैंने अपने आपको देखा ; अकेला न होकर भी अकेला... [पूरी पोस्ट]
writer Vijay Kumar Sappatti
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[23 Apr 2009 03:32 AM]

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