पुकार

परिचर्चा त्याग कर अभिमान अपना रख धरा का मान ले तू पाया बहुत कुछ अभी तक अब दान की भी ठान ले तू जी चुका बहुत अभी तक निज, सखा, संतान खातिर. मान ले तू, धर्म तेरा है निज नहीं, संसार-सेवा. जो जिया है व्यर्थ अभी तक हो गयी हो क्षीण शक्ति. माना यह अंतिम प्रहर है फिर भ... [पूरी पोस्ट]
writer कौतुक
views
24
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
4
[22 Apr 2009 23:58 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix