अस्सी बरिस के बाँका : बाबू वीर कुँअर सिंह
लह-लह धरती खूब अघइली, भइल सोर जोरे मयदान, उ तेइस अपरिल महीना, बिजय पताका उड़े असमान।" ए पंक्तियन में लोककवि हीरा प्रसादजी जवने बिजय पताका के बात क रहल बानीं ओके लहरावेवाला बाबू कुँअर सिंहजी रहनीं। 80 बरिसहा बाँका, बीर, गबड़ू जवान बाबू कुँअर सिंहजी 18...
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प्रभाकर पाण्डेय
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[22 Apr 2009 23:23 PM]



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