यूँ हीबिखरा बिखरा सा वजूद है मेरा
कि ताबों के पन्नों को पलट के सोचता हूँ, यूँजिन्दगी भी पलट जाये तो क्या बात है. ख्वाबों में तो हरदम मिलता हीहै वो, आहकीकत में लिपट जाये तो क्या बात है कुछ मतलब लिए ढ़ूँढ़ते हैं सबमुझको आ बेमतलब निकट जाये तो क्या बात है यूँ हीबिखरा बिखरा सा वजूद है मेरा...
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संजय तिवारी ’संजू’
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[22 Apr 2009 06:46 AM]



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