शायद
बाक़ी नहीं है दिल में कोई कराह शायद मुद्दत हुई, हुए थे हम भी तबाह शायद फिर से जहान वाले बदनाम कर रहे हैं फिर से हुई है हम पर उनकी निगाह शायद किस बात पर तू सबसे इतना ख़फ़ा-ख़फ़ा है तुझको कचोटता है तेरा गुनाह शायद फिर रेत पर लहू की बूंदें दिखाई दी हैं...
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चिराग जैन CHIRAG JAIN
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[01 Apr 2009 00:51 AM]



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