कोई सरापा ग़ज़ल
कहाँ अचानक मिले हैं हम तुम, यहाँ के मौसम में शायरी है जवान रुत, मदभरी हवाएँ, ये शाम जैसे ठहर गई है महकती रुत उनके सुर्ख नाज़ुक लबों को छूकर बहक रही है सनम के भीगे बदन की लरजिश हमारे लहजे में आ गई है जो सोच की हद में आ गया हो, वो चाहे जो भी हो आदमी है...
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चिराग जैन CHIRAG JAIN
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[02 Apr 2009 03:57 AM]



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