जिज्ञासा: एक मनुज धर्म
भूल हो जाती है
ललक पड़ता है ये मन
जब उत्सुकता खींच लाती
चेतना से बचपन में.
क्या करुँ मैं अज्ञान.
रहता नहीं परिपक्व चिंतन
जो हुआ प्रसन्न कभी.
छूट जाते होश मेरे
है फिर वही एक चूक होता.
एक चूक!
डरा देती चित्त चपल को.
जैसे साईकिल से नवयुवक
को गिरा देती स...
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कौतुक
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[21 Apr 2009 09:11 AM]



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