वह जान के भी अनजान बना रहा
वह जान के भी अनजान बना रहा दिलो का फासला सुनसान बना रहा कितना जाहिल निकला मेरा दोस्त रकीब के घर मेहमान बना रहा यह कैसी मोहबत है अजनबी ज़ख्म भर गया निशान बना रहा सैलाब में डूब गया शहर लेकिन पत्थर का बुत भगवान बना रहा न लुना न इच्छरा न पूरण भगत ख्वाब फ़...
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Rahul kundra
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[21 Apr 2009 05:12 AM]



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