जब इतने दिन ढोया है तो ढो ले और अंधेरा थोड़ा
नूर मुहम्मद नूर की ग़ज़ल रोग भयंकर हो जाती है, धीरे-धीरे खांसी माई यही भाग का लेखा अपना, काहें होत रुआंसी माई। दाना एक नहीं है घर में, पेट जल रहे चूल्हे ठंडे तू ही नहीं अकेली दुखिया, चारों ओर उदासी माई। तन पथरीला दिन पथरीले सपने भी पथरीले निकले दिन भ...
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Satyendra Prasad Srivastava
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[19 Apr 2009 12:17 PM]



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