du:swapna
बड़ी सर्द हैं ये यादें ठिठुरने भी नहीं देती हैं, अक्सर चढ़ जाती हैं सवालों की सीढिय़ां तो जवाबों केपदचाप सुनकर भी उतरने नहीं देती हैं । फिर मैं औकात में आकर उनके दो हिस्से कर देता हूं, खुशनुमा को रजाई बना लेता हूं, स्याह को मफलर सा बांधता हूं करवटों क...
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durgesh
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[19 Apr 2009 12:05 PM]



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