पहचान का संकट बनाम दिल्ली प्रवास !

apni baat!  Umesh Pathak ke saath. यूँ तो हर और है बेशुमार आदमी, फ़िर भी तनहाइओं का का शिकार आदमी ! दिल्ली में एक दुकान पर जहा मेरा लगभग रोज का आना-जाना था ,एक आदमी को अक्सर देखता था!सम्बन्ध केवल एक-दुसरे को देखने का ही था,एक दिन करीब ४ साल के बाद हमारा परिचय होता है और वो व्यक्ति बतात... [पूरी पोस्ट]
writer Umesh Pathak / उमेश पाठक
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[19 Apr 2009 06:01 AM]

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