तुम खट्टी होगी...
तुम खट्टी होगी... पर सच्ची होगी... अभी छौंक रही होगी हरी चिरी मिर्चें... खट्टे करौंदों के साथ... या कच्ची आमी के... या नींबू के... या ना भी शायद... नाप रही होगी अपना कंधा... बाबू जी के कंधे से... या भाई से... और एड़ियों के बल खड़ी तुम्हारी बेईमानी बड...
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देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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[18 Apr 2009 20:25 PM]



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