हे पार्थ ! दो कप चाय पर.. लिखता रह तू ब्लाग
पिछले शनिवार को कुछ.. और इस शनिवार को इनपर इतने लहालोट हुये जा रहे हो.. तुम भी उमा भारती हो क्या .. ? या फिर इनसे कोई सौदा सेट हो गया है ? भईया, ई पंडितइनिया हमका जिये न देई.. लेयो टोंकि दिहिन ! भगवान इनका मुँह चीरते समय कुछ ज़्यादा ही उदार हो ग...
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डा० अमर कुमार
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[18 Apr 2009 15:18 PM]



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