सांझ ढले आईना देखा
दाईं भौंह पर कटे का निशान आंखों की कोर पर कौओं के पंजे माथे पर आड़े-तिरछे टूटे-बिखरे इतने सारे बल सब कुछ ठीक होने पर भी जो नहीं जाते नहीं जाते निचले होंठ के दोनों किनारों पर नीचे को निकलती गहरी नालियां दाईं लंबी बाईं कुछ छोटी आंखें भीतर को धंसी चुंधि...
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चंद्रभूषण
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[18 Apr 2009 09:45 AM]



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