रीति-रिवाज़ ही नहीं संविधान भी बदलना होगा..
आज़ादी, लोकतंत्र और मौलिक अधिकार मिलने के बाद क्या आपको नही लगता की हमलोगों ने अपनी सोचने समझने की ताकत खो दी है?? देश, समाज, यहाँ तक कि हमारी अपनी जिन्दगी कौन सी दिशा की और जा रही है, किसी के पास वक्त नहीं है ये सब सोचने का॥ त्रिशंकु सरकारें देखते-दे...
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[17 Apr 2009 15:23 PM]



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