मेरे भोले सिसकते मन

कुछ ग़ज़ल कुछ गीत ! मेरे भोले सिसकते मन! मेरे कातर करुण क्रंदन!न रोओ ; चुप भी हो जाओ;चलो चुपचाप सो जाओ। बढ़ीं इतनी निराशाएं , कि जीवन भार लगता है; बहुत उलझा हुआ इस विश्व का व्यापार लगता है। जनाज़ों के शहर में ज़िंदगी को कौन पूछेगा? मुखौटों के नगर में आदमी को कौन पूछेगा??यह... [पूरी पोस्ट]
writer Dr. Amar Jyoti
views
30
upvote
2
downvote
0
rating
2
comments
4
[17 Apr 2009 14:00 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix