मेरे भोले सिसकते मन
मेरे भोले सिसकते मन! मेरे कातर करुण क्रंदन!न रोओ ; चुप भी हो जाओ;चलो चुपचाप सो जाओ। बढ़ीं इतनी निराशाएं , कि जीवन भार लगता है; बहुत उलझा हुआ इस विश्व का व्यापार लगता है। जनाज़ों के शहर में ज़िंदगी को कौन पूछेगा? मुखौटों के नगर में आदमी को कौन पूछेगा??यह...
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Dr. Amar Jyoti
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[17 Apr 2009 14:00 PM]



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