पाषाण हृदया
तुम---- सैकत-कणों पर कोई हस्ताक्षर नहीं जो वायु-वेग से उड़ जाओगे या कि---- समुद्र की उठती उर्मियाँ, तुम्हें मिटा देंगी---- हथौड़ी-सी चोट करते तुम्हारे शब्द---- और छेनी की तरह बेधते तुम्हारे व्यंग्य---- प्रस्तर कर शनैः - शनैः तुम्हारा नाम लिखते रहे बहुत...
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Jyotsna Pandey
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[17 Apr 2009 12:22 PM]



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