तेरे वादे पे जिए हम, ये तू जान भूल जाना
तेरे वादे पे जिए हम, ये तू जान भूल जाना शेर तो जनाब मिर्जा ग़ालिब का है। सभी जानते हैं और जो लिखने जा रही हूं वो परसाई साहब की पोटली में से है। चुनाव की बहार है, हरिशंकर परसाई की "आवारा भीड़ के खतरे" किताब के एक चैप्टर पर नज़र चली गई। उससे कुछ लाइनें...
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वर्षा
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[17 Apr 2009 03:02 AM]



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