लगता नहीं अब जी मेरा ..

फुरसत के रातदिन लगता नहीं अब जी मेरा, मेरे हमनफस कहीं और चल जहाँ दिल-ए-ज़ार को हो सुकूं किसी ऐसी बस्ती की ओर चल दिखावे के रिश्तों से दूर हट ज़रा दूर हट ज़रा बच के चल जहाँ मेरी रूह को हो सुकूं किसी ऐसी बस्ती की ओर चल ये नहीं है अब तेरा रह गुज़र कहीं और चल कहीं और चल... [पूरी पोस्ट]
writer अभिषेक'शफक़'
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[17 Apr 2009 00:44 AM]

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