हम सुपारी-से
दिन सरौता हम सुपारी-से। ज़िंदगी-है तश्तरी का पान काल-घर जाता हुआ मेहमान चार कंधों की सवारी-से। जन्म-अंकुर में बदलता बीज़ मृत्यु है कोई ख़रीदी चीज़ साँस वाली रेजगारी-से। बचपना-ज्यों सूर, कवि रसखान है बुढ़ापा-रहिमना का ग्यान दिन जवानी के बिहारी-से। डॉ०...
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डॉ० कुअँर बेचैन
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[16 Apr 2009 03:40 AM]



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