कल चुनाव है
है आज मुझे नहीं, कुछ सूझ रहा.
और ना ही यह मन, कुछ बूझ रहा.
मुझको है चुनना, मेरा नेता, पर हा!
चाल-चलन उनका, अब भी अनबूझ रहा.
कब तक यूँ अन्धकार में
देगा शब्दभेदी वोट तू.
खोले आँखें, देख बाहर
है कितना प्रकाश पड़ा.
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[16 Apr 2009 02:10 AM]



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