समय हो गया लो चला जा रहा हूं...
अप्रैल 09 समय का पहरुआ बड़ा ही सजग है किसी को भी रुकने ना देगा यहां पर सभी हैं मुसाफिर उमर की डगर के किसी को न मिलती है मंजिल यहां पर लिए जा रहा हूं ये आंसू नयन में सुनहरे सपन सब दिए जा रहा हूं समय हो गया लो चला जा रहा हूं... न सोचो कि पूरी न हो पाई...
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अनिल कुमार वर्मा
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[15 Apr 2009 14:15 PM]



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