अंतर्ज्ञान
तन की सीमाओं को जो जान पाती मैं फिर कभी न चाह करती तिनकों की ओक़ पर से ओस चुगने की ................. और मन के जो घेरें हैं असीमित खदेड़ते है मुझको वर्जित जग को पाने की खातिर ..............
[पूरी पोस्ट]
swati
37
3
0
3
13
[14 Apr 2009 15:38 PM]



Shuffle








