मैं कवि बनता नहीं

मोहन का मन खाली कागज पर नीली स्‍याही वाले पैन से चंद आडी तिरक्षि‍ लकीरें खींचने से कोई कविता नहीं बनती न ही कोई कवि बन जाता ऐसे ही कवि बनने के लिए अपना दिल बाहर निकाल खून से उस पर लिखना आंसुओं से उसको सींचना और फिर मन के किसी कोने से दिमाग के किसी हिस्‍से से डा... [पूरी पोस्ट]
writer मोहन वशिष्‍ठ
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[14 Apr 2009 04:47 AM]

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