तृषा'कान्त'

तृषा'कान्त' वो बरगद का वृक्ष बुढ़ा गया था उसकी जड़ों से फूट्कर निकले चिल्लड़ अब खुद बन गये थे जवान बरगद और अपनी बल शाली शा खाओं की नाजुक उंगलियों से दे रहे थे बुढाते वृ क्ष को सहारा वह बूढ़ा बरगद थक गया था झड़ गए थे उसके पत्ते टूट फूट गईं थीं उसकी बल शाली शा खाए... [पूरी पोस्ट]
writer श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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[14 Apr 2009 02:31 AM]

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