मैं इक और गीत रच डालूँ
बुझे बुझे सरगम के सुर हैंथके थके सारे नूपुर हैंशब्दों का पिट गको आतुर हैभावों की लुट हई पोटली अनुभूति के कोष रिक्त हैंऔर तकाजा एक तुम्हारा मैं इक नया गीत लिख डालूँअक्षर अक्षर बिखर गई हैंगाथाय्रं कुब याद नहीं हैंशीरीं तो हैं बहुत एक भीलेकिन पर फ़रहाद न...
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राकेश खंडेलवाल
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[13 Apr 2009 22:56 PM]



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