मेरी कल्पनाएं और मेरे शब्द...

MERA SAGAR चांद को चांद न कहूं, रजनी का चिराग कहूं, तारों को तारे न कहूं, निशा की बारात कहूं। देख कर यूं पलटना, ये लहरें नहीं, सागर की अंगड़ाई हैं, दर्द के भंवर ने जैसे, कहीं गर्म हवा सहलाई है। पक्षियों का चहकना भी, हो जैसे मीठा राग कोई, एक कतार में बैठे हो, कई... [पूरी पोस्ट]
writer PREETI BARTHWAL
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[13 Apr 2009 20:44 PM]

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