कहां होंगी जगन की अम्मा ?

असुविधा सतरंगे प्लास्टिक में सिमटे सौ ग्राम अंकल चिप्स के लिये ठुनकती बिटिया के सामने थोड़ा शर्मिन्दा सा जेबें टटोलते अचानक पहुंच जाता हूं बचपन के उस छोटे से कस्बे में जहां भूजे की सोंधी सी महक से बैचैन हो ठुनकता था मैं और मां बांस की रंगीन सी डलिया में दो मु... [पूरी पोस्ट]
writer अशोक कुमार पाण्डेय
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[13 Apr 2009 14:28 PM]

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