सोचा जी लूँ जरा-जरा सी...
क्योंकि ज़िन्दगी है कम मेरी बाकि... तो सोचा जी लूँ इसे जरा-जरा सी... थोड़ी धूप, थोड़ी धुंध और थोड़ी बरसात के लिए और थोड़ी हौले-हौले से गुजरती... अपनी साथी रात के लिए जो हो गया सवेरा, तो रात भी ढल जायेगी... नयी सुबह ना जाने? क्या पैगाम लेकर आयेगी... कहीं...
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मीत
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[13 Apr 2009 07:08 AM]



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